राजस्थानी मुहावरे एवम् लोकोक्तियाँ

Rajasthani Muhavare-Kahawat-lokoktiyan / राजस्थानी लोकोक्तियाँ-मुहावरे-कहावतें

Hello Friends Rajasthani Muhavare-Kahawat-lokoktiyan Important Topic In Rajasthan Exam Like Rajasthan High Court Group-d, BSTC, PTET 2020, Rajasthan Police, Patwar And Rajasthan Gk Very Important Topic. राजस्थानी लोकोक्तियाँ-मुहावरे-कहावतें यह राजस्थान के सभी एग्जाम में इंपॉर्टेंट टॉपिक है जिसके क्वेश्चन सामान्यत सभी परीक्षाओं में पूछे जाते हैं इसलिए हम इस पोस्ट में आप सभी के साथ इसकी चर्चा करेंगे मुझे उम्मीद है कि आपको यह पसंद आएंगे और आप इन को ज्यादा से ज्यादा शेयर करेंगे और आपके आने वाले एग्जाम में इनमें से ही क्वेश्चन पूछे जाएंगे तो प्लीज आप सभी से रिक्वेस्ट है कि इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि इसका लाभ सभी ले सके और इसमें अगर कुछ भी गलतियां हो तो प्लीज हमें माफ करें और सुधार के लिए कमेंट जरूर करें.

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राजस्थानी लोकोक्तियाँ-मुहावरे-कहावतें

ठावें-ठावें टोपली,बाकी ने लंगोट।
ठावें-ठावें टोपली,बाकी ने लंगोट।

शब्दार्थ :- कुछ चुने हुए लोगों को टोपी दी गयी परन्तु शेष लोगों को सिर्फ लंगोट ही मिली ।

भावार्थ :- कुछ विशेष चयनित लोगों का तो यथोचित सम्मान किया गया परन्तु शेष लोगों को जैसे-तैसे ही निपटा दिया गया / कुछ महत्वपूर्ण कार्यों को कर लिया परन्तु सामान्य कार्यों की उपेक्षा कर दी गयी।




ठठैरे री मिन्नी खड़के सूं थोड़ाइं डरै !
ठठैरे री मिन्नी खड़के सूं थोड़ाइं डरै !

शब्दार्थ :- ठठैरे ( जो की धातु की चद्दर की पीट -पीट कर बर्तन बनाता है ) के वहां रहने वाली बिल्ली खटखट करने से डरकर नहीं भागती क्योंकि वह तो सदा खटखट सुनती रहती है।

भावार्थ :- किसी कठिन माहौल में रहने-जीने व्यक्ति के लिए वहां की कठिनाई आम बात होती हैं,वह उस परिस्तिथि से घबराता नहीं है।

कमाऊ आवे डरतो ,निखट्टू आवे लड़तो !
कमाऊ पूत आवै डरतो, अणकमाऊ आवै लड़तो।

शब्दार्थ :- कमाने वाला बेटा तो घर में डरता हुआ प्रवेश करता है, लेकिन जो कभी नहीं कमाता वह लड़ाई झगडा करते हुए ही आता है।

भावार्थ :- परिवार में धनार्जन करने वाले व्यक्ति को हर समय अपने मान-सम्मान का ध्यान रहता है, लेकिन निखट्टू को अपनी बात मनवाने का ही ध्यान रहता है।

ब्यांव बिगाड़े दो जणा , के मूंजी के मेह , बो धेलो खरचे न’ई , वो दडादड देय !
ब्यांव बिगाड़े दो जणा , के मूंजी के मेह ,
बो धेलो खरचे न’ई , वो दडादड देय !

शब्दार्थ :-विवाह को दो बातें ही बिगाड़ती है, कंजूस के कम पैसा खर्च करने से और बरसात के जोरदार पानी बरसा देने से .

भावार्थ :-काम को सुव्यवस्थित करने के लिए उचित खर्च करना जरुरी होता है,वहीँ प्रकृति का सहयोग भी आवश्यक है।

हूं गाऊँ दिवाळी’रा, तूं गाव़ै होळी’रा ।
हूं गाऊँ दिवाळी’रा, तूं गाव़ै होळी’रा ।

शब्दार्थ :- मैं दिवाली के गीत गाता हूँ और तू होली के गीत गाता है।

भावार्थ:- मैं यहाँ किसी प्रसंग विशेष पर चर्चा कर रहा हूँ और तुम असंबद्ध बात कर रहे हो।

म्है भी राणी, तू भी राणी, कुण घालै चूल्हे में छाणी ?
म्है भी राणी, तू भी राणी, कुण घालै चूल्हे में छाणी?

शब्दार्थ :- मैं भी रानी हूँ और तू भी रानी है तो फिर चूल्हे को जलाने के लिए उसमें कंडा/उपला कौन डाले ?
भावार्थ :- अहम या घमण्ड के कारण कोई भी व्यक्ति अल्प महत्व का कार्य नहीं करना चाहता है।

मढी सांकड़ी,मोड़ा घणा !
मढी सांकड़ी,मोड़ा घणा !

शब्दार्थ:-मठ छोटा है और साधु बहुत ज्यादा हैं। (मोडा =मुंडित, साधु)

भवार्थ:- जगह/वस्तु अल्प मात्रा में है,परन्तु जगह/वस्तु के परिपेक्ष में उसके हिस्सेदार ज्यादा हैं।

Rajasthani Muhavare-Kahawat-lokoktiyan

Sabhi Important Hai Rajasthan KE Har Exam Se Related Sabhi Se Question Puche Jayenge Rajasthani Muhavare-Kahawat-lokoktiyan Se Har Exam Me 2-3 Question Aayeng. BSTC, PTET 2020, RAJASTHAN HIGH COURT Group-d.

आप री गरज गधै नेै बाप कहवावै!
आप री गरज गधै नेै बाप कहवावै!

शब्दार्थ:-अपनी जरुरत/अपना हित गधे को बाप कहलवाती है।

भावार्थ :-स्वार्थसिद्धि के लिए अयोग्य/ कमतर व्यक्तित्व वाले आदमी की भी खुशामद करनी पड़ती है।

चिड़ा-चिड़ी री कई लड़ाई, चाल चिड़ा मैँ थारे लारे आई |
चिड़ा-चिड़ी री कई लड़ाई, चाल चिड़ा मैँ थारे लारे आई |

शब्दार्थ:-चिड़िया व चिड़े की कैसी लड़ाई,चल चिड़ा मैं तेरे पीछे आती हूँ।

भावार्थ :- पति-पत्नी के बीच का मनमुटाव क्षणिक होता है।

चाए जित्ता पाळो , पाँख उगता ईँ उड़ ज्यासी |
चाए जित्ता पाळो , पाँख उगता ईँ उड़ ज्यासी |

शब्दार्थ:-पक्षी के बच्चे को कितने ही लाड़–प्यार से रखो,वह पंख लगते ही उड़ जाता है।

भावार्थ :- हर जीव या वस्तु उचित समय आने पर अपनी प्रकृति के अनुसार आचरण अवश्य करते ही हैं।

पड़ै पासो तो जीतै गंव़ार !
पड़ै पासो तो जीतै गंव़ार !

शब्दार्थ :- पासा अनुकूल पड़े,तो गंवार भी जीत जाता है. (चौसर के खेल में सब कुछ दमदार पासा पड़ने पर निर्भर करता है, उसमें और अधिक चतुराई की आवश्यकता नहीं होती है)

भावार्थ:- भाग्य अनुकूल हो तो अल्प बुद्धि वाला भी काम बना लेता है, नहीं तो अक्लमंद की भी कुछ नहीं चलती।

नागां री नव पांती अ’र सैंणा री एक।
नागां री नव पांती अ’र सैंणा री एक।

शब्दार्थ :- उदण्ड/स्वछन्द व्यक्ति को किसी चीज के बंटवारे में नौ हिस्से चाहिए.

भावार्थ:- उदण्ड/स्वछन्द व्यक्ति किसी साझा हिस्से वाली चीज़ या संपत्ति में से अनुचित हिस्सेदारी लेना चाहता है जबकि सज्जन व्यक्ति अपने हक़ के ही हिस्से से ही संतुष्ठ रहता है.

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कार्तिक की छांट बुरी , बाणिये की नाट बुरी , भाँया की आंट बुरी , राजा की डांट बुरी।
कार्तिक की छांट बुरी , बाणिये की नाट बुरी ,
भाँया की आंट बुरी , राजा की डांट बुरी।

अर्थ – कार्तिक महीने की वर्षा बुरी , बनिए की मनाही , भाइयों की अनबन बुरी और राजा की डांट-डपट बुरी।

आळस नींद किसान ने खोवे , चोर ने खोवे खांसी , टक्को ब्याज मूळ नै खोवे , रांड नै खोवे हांसी।
आळस नींद किसान ने खोवे , चोर ने खोवे खांसी ,
टक्को ब्याज मूळ नै खोवे , रांड नै खोवे हांसी।

अर्थ – किसान को निद्रा व आलस्य नष्ट कर देता है , खांसी चोर का काम बिगाड़ देती है , ब्याज के लालच से मूल धन भी है डूब जाता है और हंसी मसखरी विधवा को बिगाड़ देती है।

जाट र जाट, तेरै सिर पर खाट। मियां र मियां , तेरै सिर पर कोल्हू। ‘क तुक जँची कोनी। ‘क तुक भलांई ना जंचो , बोझ तो मरसी।
जाट र जाट, तेरै सिर पर खाट।
मियां र मियां , तेरै सिर पर कोल्हू।
‘क तुक जँची कोनी।
‘क तुक भलांई ना जंचो , बोझ तो मरसी।

अर्थ – एक मियाँ ने जाट से मजाक में कहा की जाट, तेरे सिर पर खाट। स्वभावतः जाट ने मियाँ से कहा की,मियाँ! तेरे सिर पर कोल्हू।मियाँ ने पुनः जाट से कहा की तुम्हारी तुकबंदी जँची नहीं तो जाट बोला की तुकबंदी भले ही न जँचे , लेकिन तुम्हारे सिर पर बोझ तो रहेगा ही।

कमाई करम की, इज्जत भरम की, लुगाई सरम की।
कमाई करम की, इज्जत भरम की, लुगाई सरम की।

अर्थ – कमाई भाग्य से होती है, जब तक भ्रम बना रहे तभी तक इज्जत है और जब तक शील संकोच बना रहता है तभी तक स्त्री, स्त्री है।

कदे ‘क दूध बिलाई पीज्या, कदे ‘क रहज्या काचो। कदे ‘क नार बिलोवै कोनी, कदे ‘क चूंघज्या बाछो।
कदे ‘क दूध बिलाई पीज्या, कदे ‘क रहज्या काचो।
कदे ‘क नार बिलोवै कोनी, कदे ‘क चूंघज्या बाछो।

शब्दार्थ:-घर में गायें होने पर भी गृह स्वामी को कभी दूध दही नहीं मिल पाता। कभी दूध को बिल्ली पी जाती है, तो कभी वह कच्चा रह जाता है। कभी घर वाली बिलोना नहीं डालती तो कभी बछड़ा चूस जाता है।

भावार्थ :- साधनो के बावजूद योजना पूर्वक कार्य नहीं करने से कार्य सिद्धि में एक न एक बाधा उपस्थित होते रहती है ।

कुत्तो सो कुत्ते नै पाळे , कुत्तोँ सौ कुत्तोँ नै मारै। कुत्तो सो भैंण घर भाई , कुत्तोँ सो सासरे जवाँई। वो कुत्तो सैं में सिरदार , सुसरो फिरे जवाँई लार।
कुत्तो सो कुत्ते नै पाळे , कुत्तोँ सौ कुत्तोँ नै मारै।
कुत्तो सो भैंण घर भाई , कुत्तोँ सो सासरे जवाँई।
वो कुत्तो सैं में सिरदार , सुसरो फिरे जवाँई लार।

अर्थ – कुत्ते को पालना अथ्वा मारना दोनों ही बुरे है। यदि भाई अपनी बहन के घर और दामाद ससुराल में रहने लगे तो उनकी क़द्र भी कम होकर कुत्ते के समान हो जाती है। लेकिन यदि ससुर अपना पेट् भरने के लिए दामाद के पीछे लगा रहे तो वो सबसे गया गुजरा माना जाता है।

आडे दिन से बासेड़ा ई चोखो जिको मीठा चावळ तो मिले
आडे दिन से बासेड़ा ई चोखो जिको मीठा चावळ तो मिले

अर्थ – सामान्य दिन कि उपेक्षा ‘बासेड़ा'[शीतला देवी का त्यौहार] ही अच्छा जो खाने के लिए मीठे चावल तो मिले।

राधो तू समझयों नई , घर आया था स्याम दुबधा में दोनूं गया , माया मिली न राम ………
राधो तू समझयों न’ई , घर आया था स्याम
दुबधा में दोनूं गया , माया मिली न राम !

अर्थ – दुविधा में दोनों ही चले गए , न माया मिली न राम
न खुदा ही मिला न विसाले सनम। ……

जीवते की दो रोटी , मरोड्ये की सो रोटी। …।
जीवते की दो रोटी , मरोड्ये की सो रोटी। …।

अर्थ – जीते हुए की सिर्फ दो रोटी और मरे हुए की सौ रोटियाँ लगती है। ….

खाट पड़े ले लीजिये , पीछै देवै न खील आं तीन्यां का एक गुण , बेस्यां बैद उकील। ……
खाट पड़े ले लीजिये , पीछै देवै न खील
आं तीन्यां का एक गुण , बेस्यां बैद उकील। ……

अर्थ – वैश्या अपने ग्राहक से और वैद्य अपने रोगी से खाट पर पड़े हुए ही जो लेले सो ठीक है, पीछे मिलने की उम्मीद न करे। …इसी प्रकार वकील अपने मुवक्किल से जितना पहले हथिया ले वही उसका ….

कै मोड्यो बाँधे पाग्ड़ी कै रहै उघाड़ी टाट। …।

कै मोड्यो बाँधे पाग्ड़ी कै रहै उघाड़ी टाट। …।

बाबाजी बांधे तो सिर पर पगड़ी ही बांधे नहीं तो नंगे सिर ही रहे। …..
बाबाजी बांधे तो सिर पर पगड़ी ही बांधे नहीं तो नंगे सिर ही रहे। …..

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